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Friday, May 25, 2018

कामयाबी इंतज़ार करवाती है, उसके लिए जल्दी मत मचाइए।

आलस से आराम मिल सकता है, पर यह आराम बड़ा ही महंगा पड़ता है। अमूमन सब सफल होना चाहते हैं, किसी भी स्थिति में कोई भी इंसान असफल तो नहीं ही होना चाहता है। तो क्या सफल होने का कोई गणित है? इसका जवाब है हाँ। जुगाड़ से इंसान को मौक़ा मिल सकता है, सफ़लता नहीं और सफलता का अर्थ केवल आर्थिक नहीं बल्कि सार्थक होना भी है। यह ज़रूरी नहीं कि जो सफल हो वो सार्थक भी हो। बहरहाल, सफल और सार्थक होने का रास्ता कठोर श्रम, निरंतर अभ्यास, मानसिक-बौद्धिक-शारीरिक और आध्यात्मिक (धार्मिक नहीं) तैयारी, उचित मार्गदर्शन, सही संगत, सकारात्मक नज़रिया और पर्याप्त धैर्य आदि के तप से होकर ही गुज़रता है, इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग ना कभी था और ना कभी होगा। केवल मानसिक रूप से सोचते रहने मात्र से कुछ ख़ास हासिल नहीं हो सकता बल्कि उसके लिए प्रयासरत भी रहना पड़ता है। जैसे बार-बार रस्सी के घर्षण से पत्थर भी कटने लगता है, ठीक उसी प्रकार। कबीर भी कहते हैं -
करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ।
रसरी आवत-जात के, सिल पर परत निशान ।।
तो किसी भी कार्य में पूरे तन, मन और धन से लगना पड़ता है तभी उसे हासिल किया जा सकता है। “अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो सारी कायनात उसे तुम से मिलाने में लग जाती है” ज़रूर सुना होगा। यह पंक्ति हमारे फ़िल्म और आजकल एक विज्ञापन में ख़ूब सुनाई पड़ रहा है लेकिन मूलतः यह पाब्लो कोइलो के विश्विख्यात उपन्यास एल्केमिस्ट का है। इसी को सिद्धांत के रूप में Law of Attraction कहा जाता है जो यह कहती है कि आप  अपने  जीवन  में  उस  चीज  को  आकर्षित  करते  हैं  जिसके  बारे  में  आप  सोचते  हैं। आपकी  प्रबल सोच हकीक़त  बनने  का  कोई  ना  कोई  रास्ता  निकाल लेती है। तो सोच को हकीक़त बनाना ही सफलता और सार्थकता की कुंजी हो सकती है।

कल एक दैनिक अखबार में "कामयाबी इंतज़ार करवाती है, उसके लिए जल्दी मत मचाइए" नामक शीर्षक से महानतम खिलाड़ी और वर्तमान में युवा क्रिकेट टीम के कोच और प्रशिक्षक राहुल द्रविड़ के विचार पढ़ने का मौक़ा मिला। उनके विचार आपके समक्ष जस का तस रख रहा हूँ। यह विचार उनको ही प्रेरित कर सकते हैं जो प्रेरित होना चाहते हैं। जो स्वयंभू हैं, उनका तो आजतक ना कुछ हुआ है और आगे होगा। राहुल को पढ़िए -

क्रिकेट ने मुझे एक बेहतर इंसान बनाया, लेकिन इसमें वक्त लगा अक्सर लोग पूछते हैं कि सफल होने का सूत्र क्या है। मैं मानता हूं कि संघर्ष करना जरूरी है और सफलता व असफलता दोनों ही इसके हिस्से हैं। आपको दोनों का सामना करना पड़ेगा। सफल होने के लिए आपको निरंतर जिज्ञासु होना होगा। ये जिज्ञासा ही है जो आपको अपनी रुचि को पहचानने में मदद करेगी। जब आप यह जान जाएंगे कि आपकी दिलचस्पी किसमें है तो आपको उस काम से प्यार हो जाएगा और आप उसे पूरी शिद्दत से कर पाएंगे। दूसरी ओर मुश्किल समय से मैंने सीखा है कि प्रेरणा आपके बहुत काम आती है। अक्सर लोग इसे किताबी ज्ञान मानते हैं, लेकिन मेरा अनुभव है कि प्रेरित करने वाली कोई भी बात आपको मुश्किल समय में मजबूत बनाने का काम करती है। अक्सर लोग सफल व्यक्ति को देखकर सोचते हैं कि इनके जीवन में कोई समस्या नहीं है या फिर इनकी जिंदगी में हमेशा से सबकुछ अच्छा था। ऐसा नहीं है। खेल को कॅरिअर के बनाने के दौरान मेरे और मेरे माता पिता के दिमाग में भी वही डर थे । जो एक सामान्य युवा और उसके , माता पिता के जेहन में होते हैं । लेकिन आपको इस डर को मैनेज करना होगा। इसके साथ अपने संघर्ष को भी अंजाम तक पहुंचाना होगा।

सफलता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए चाहिए मजबूत आधार युवा पीढ़ी के साथ एक समस्या है कि उसमें धैर्य की कमी है। वह सब कुछ जल्दी से हासिल कर लेना चाहती है, लेकिन आपको समझना होगा कि कामयाबी इंतजार करवाती है। मैं इस बात को एक चाइनीज बैंबू के माध्यम से समझाना चाहूंगा। एक चाइनीज बैंबू के बीज को अपने बगीचे में लगाइए और उसे सींचिए आप पाएंगे कि पहले एक साल में कोई अंकुर नहीं फूटा। फिर देखेंगे कि अगले पांच साल तक भी कोई अंकुर नहीं पनपा, लेकिन फिर एक दिन एक छोटा तिनका जमीन के बाहर नजर आएगा, जो आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रहा है और सिर्फ 6 हफ्तों में 90 फीट का हो गया है। इस पौधे ने क्या किया 5 साल तक अपनी जड़ें जमाई ताकि वह अपनी 90 फीट की ऊंचाई को लंबे समय तक संभाल सके। कामयाब होना आसान है, लेकिन उसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए एक मजबूत आधार की जरूरत होती है। इसमें समय लगता है।
परिणाम एकदम आखिरी प्रक्रिया है, उसके पहले की तैयारी महत्वपूर्ण है। लोग कहेंगे कि यह चाइनीज बैंबू 6 महीने में 90 फीट का हो गया, लेकिन मैं कहूंगा इसे यहां तक पहुंचने में 5 साल 6 महीने लगे

ज्यादा से ज्यादा सहयोगी बनाइए

हर सफल व्यक्ति के पीछे ढेरों लोगों का सहयोग होता है। यह सपोर्ट ही है, जो आपको असफलता के बाद फिर से खड़ा होने की उम्मीद देता है। मेरे साथ यह कई बार हुआ जब मुझे परिवार के साथ-साथ ऐसे लोगों का भी सहयोग मिला जिनसे मुझे कोई उम्मीद नहीं थी इसलिए ज्यादा से ज्यादा सहयोगी बनाइए। वे आपको बेहतर बनाने के लिए अपनी अमूल्य राय देंगेजो आपको सफलता के करीब ले जाएगी। याद रखेंसफलता लक्ष्य नहीं एक यात्रा है, जिसमें आपको कई बार निराश होना पड़ेगा, लेकिन यह इसका जरूरी हिस्सा है। आपकी दृढ़ता भी आपको इस तक पहुंचने में मदद करेगी। कामयाबी के फल के लिए दृढ़ता का बीज रोपना जरूरी है। इतना ही नहीं जब वह आपको जाए तो उसकी इज्जत भी करें।

Monday, May 21, 2018

दरअसल कानून की भाषा बोलता हुआ यहां अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।


मध्यप्रदेश का एक किसान 45 डिग्री सेल्सियस में 4 दिन से मंडी में अपनी फसल की तुलाई होने का इंतज़ार लाइन में लगकर करता है और अन्तः उसकी मौत हो जाती है। अब मरने से पहले मूलचंद नामक इस किसान ने "हे राम" या "भारत माता की जय" या "मेरा भारत महान" का जयघोष किया था या नहीं, यह अभी तक पता नहीं चल सका है। यह भी संभव हो कि मरते वक्त इसका पेट ख़ाली हो और उसके मुंह से "आलू" "चना" या 'प्याज़" नामक शब्द निकल हो। यह किसको वोट देता था और किसकी भक्ति करता था, यह भी अभी तक पता नहीं चल सका है। अगर पता चल जाता तो कहीं न कहीं से एक ट्यूट ज़रूर आता।
वैसे भी यह कोई ख़ास ख़बर नहीं है क्योंकि देश "हर हर घर घर" की भक्ति या विरोध में मस्त है, लीन है और व्यस्त है। बड़ा बड़ा विकास हो रहा है, इन फालतू की बातों पर कौन ध्यान दे!
वैसे भी इस देश का किसान, मजदूर, बेरोज़गार नवयुवक आदि एक कीड़े में परिवर्तित कर दिया गया है, एकदम काफ़्का की कहानी "मेटामोरफॉसिस" की तरह। जो धर्म, जाति, देशप्रेम, संस्कृति, नैतिकता, मर्यादा आदि के नाम पर या तो मानसिक ग़ुलामी करने को अभिशप्त है या अराजक होने को या फिर जीने की जीतोड़ कोशिश में अपने प्राण त्यागने को। यह सुनियोजित साजिश के तहत की जानेवाली हत्याएं हैं, एक्सिडेंटल डेथ या आत्महत्या की शक्ल में और इन हत्याओं के लिए वो सब ज़िम्मेवार हैं जिनपर भी इनकी सूरत बदलने की जवाबदेही और ज़िम्मेदारी है, या होती है।
कोई सत्ता के घमंड में चूर है तो कोई छीन गई सत्ता को कैसे भी वापस लाने की जुगाड़ में। कोई अपना जुगाड़ में लगा है तो कोई अपनों की जुगाड़ में। कहीं अपनी हवाई उपलब्धियों का हवा-हवाई और आक्रामक प्रचार है तो कहीं उस हवाई फायर का पुरज़ोर हवाई विरोध और समर्थन और कुछ हम आप जैसे भी महात्मा हैं जो फेसबूक पर पोस्ट मात्र डालकर लाइक कमेंट के खेल से अपनी सार्थकता और सामाजिक सरोकरता सिद्ध करने में लगे हैं। हम सब मिगुएल द सर्वांते के उपन्यास के पात्र डॉन क्युकजोर्ट बन चुके हैं जो सामाजिकता और सरोकार के नाम पर हवाई लड़ाइयों में मस्त है। हमारे हाथों में बरछी, भला, बल्लम की जगह चाइनीज़, कोरियन, अमेरिकन आदि मोबाइल है फ्री के डाटा कनेक्शन के साथ और दिन रात इसमें उंगली करने को अभिशप्त हो गए हैं। टीवी डिबेट से हम क्रांति की उम्मीद करने वाले यूटोपियन पिस्सू बन गए हैं हम। बाकी सच में और यथार्थ की धरातल पर समाज को सुंदर, सुलभ और मानवीय मेहनकश वर्ग के सर्वथा अनुकूल बनाने के लिए कौन क्या कर रहा है, यह तथ्य हम सब जानते हैं - अब उसे माने या ना माने यह अलग बात है। वैसे भी पूंजीपतियों के टुकड़ों पर चलने वाली पार्टियां और पलने वाले नेता क्या ख़ाक सेवा करेगें देश के आवाम की।
पूरे देश में किसानों की दैनीय स्थिति के बारे में शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा और अगर कोई अनभिज्ञ है तो उस महान आत्मा को 101 तोपों की सलामी। तो साहिबान, लीजिए प्रस्तुत है उस मारे हुए किसान की तस्वीर ताकि आपको दुःख जैसे महसूस कुछ करने में ज़्यादा ज़ोर ना लगाना पड़े। तो आइए हम सब "जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान" कहते हुए दुःखी जैसा कुछ इमोशन क्रिएट करते हैं। हमारी भावनाएं मिथकीय चरित्रों के लिए जागती हैं और जागती आखों और जीवित मनुष्यों के लिए ना जाने कब का हमारा हृदय पत्थर हो गया है, आंखों के आंसू सूख चुके हैं और गुस्से का हस्तमैथून हो चुका है।
बतोलेबाज़ी और जुमलेबाजी और सत्य का फ़र्क ना जाने कब का भूल चुके हैं हम। सच हमने जाना नहीं, पढ़ा नहीं, खोजा नहीं तो सच सच हो या ना हो लेकिन झूठ भी सच ही होगा। सवाल यह नहीं कि हम किसको मानते हैं बल्कि सवाल यह है कि हम सच में किसको जानते हैं, एकदम सही सही।
यह उस किसान की एक फाइल फोटो है। ग़ौर से देखिए इसके सिंघासन को, इसकी फसल ही इसका सिंघासन है और यह आशा भरी नजरों से पता नहीं किधर देख रहा है। पता नहीं किससे इसे उम्मीद है अब भी। देश का पेट भरनेवाला यह किसान खुद कैसा दिखता है, यह भी देख ही लीजिए। प्रधानसेवक के चेहरे से इसके चेहरे का मिलान भी कर लीजिए। उसकी दर्दनाक मौत (हत्या) की तस्वीरें और मौत का तमाशा देखते लोगों की तस्वीर भी नेट पर उपलब्ध हैं। अगर इस फोटो से सच्ची फिलिंग नहीं आ रही तो कृपया एल बार उन तस्वीरों का भी अवलोकन करें।
इस फालतू के स्टेटस को पढ़ने में जो कीमत समय गया उसकी भरपाई हम पतंजलि के स्वदेशी प्रोडक्ट के साथ आईपीएल का T20 क्रिकेट मैच देखकर या कर्नाटक पर गर्मागर्म बहस करके कर सकतें हैं या कुछ नहीं तो आराम से खाते - पीते मोदी-राहुल-कम्युनिस्ट-समाजवादी, हिन्दू-मुसलमान, भारत-चीन-रूस-पाकिस्तान, देशप्रेमी-देशद्रोही ही कर लेते हैं - वक्त कट जाएगा, आराम से।
जब तक सर्वहारा, मजदूर, किसान, मेहनतकश और शोषित तबका एकजुट होकर अपने सच्चे प्रतिनिधित्व को सत्ता के शीर्ष पर काबिज़ नहीं करते और लगातार सतर्क और सक्रिय नहीं होते, तब तक स्थिति यही होगी। केवल इसको या उसकव वोट करने मात्र से हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का निर्वाह नहीं हो जाता। बाकी धोखा का क्या है वो तो हर रंग वाले रंगे सियार घूम ही रहें हैं नेता, बुद्धिजीवी, कलाकार का चोला धारण करके, जिसे धूमिल "कानून की भाषा बोलता हुआ अपराधियों का संयुक्त परिवार कहते हैं।" और सत्य के साथ पूरी ताक़त और मजबूती से खड़े होने के हमारे साहस का बलात्कार हो चुका है, रोज़ हो रहा है बाकी सत्यमेव जयते का कानफाड़ू जयघोष तो हर जगह है ही!!!
ज़िंदा लोग मौन रहें तो मुर्दे सवाल करते हैं।
इस देश को कौन चला रहा है ? इस सवाल का जवाब में हम सबके दिमाग में किसी नेता का नाम आता है जबकि सच यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश उसके मेहनतकश किसान और मज़दूर चलाते हैं लेकिन दुःखद सच यह है कि इस देश में सबसे ज़्यादा बुरी स्थिति इन्हीं की है। देश के नौजवानों की बेरोज़गारी, किसानों की आत्महत्या (जो दरअसल हत्या है), मज़दूरों और सर्वहारा क्लास की नारकीय ज़िन्दगी के बीच विकास का क़सीदा कोई कसाई भी नहीं पढ़ सकता।
यह व्यवस्था अगर केवल मुआवजे देने और हम केवल अत्यंत दुःखद वाक्यों से सराबोर फेसबूक स्टेटस लिखने में मशगूल हैं तो यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि हमारी हत्या बहुत पहले हो चुकी है और हम केवल ज़िंदा रहने का नाटक कर रहें हैं।
जिस मुल्क में जिंदा लोग मुर्दा हो जाएं वहां लाशें बोलती हैं और अपने लहू और पसीने का हिसाब पाई पाई वसूलती हैं। जब ज़िंदा लोग सवाल करना बंद कर देते हैं और भक्ति में लीन हो जाते हैं तब मुर्दे सवाल करेगें और उनके सवालों को जिसने भी अनदेखा किया उसका नामोनिशान इतिहास से खत्म हो गया। अच्छे-अच्छे का सिंघासन डोल गया।
सिर्फ सरहद पर लड़नेवाला ही शाहिद नहीं होता बल्कि आंख खोलकर देखा जाय तो उस देश के किसान मजदूर और युवा रोज़-रोज़ तिल - तिल करके शाहिद हो रहे हैं।
जिस दिन इस देश के मेहनतकश एकजुट होकर अपना हिसाब मांगेंगे उस दिन पता चलेगा कि सच में किसने क्या किया। तबतक देश को जितना बहकाना है, बहका लो।